कुछ अनकही दीवारें

दूसरा पहर लग गया है।

शांती है चारों ओर, दूर सड़कों पर कुछ गाड़ियां गुजर रही हैं। आवाजें कुछ मिली जुली हैं; तेज हवा की और भारी मालवाहक से उठे कंपन, अचानक कुछ जहाजों की भी, हवाई मार्ग से गुजरते हुए। 

ये तो रही बाहर की बात।

अंदर आज कुछ खालीपन है। पर ये कंपनों में कुछ समानता जरूर है। 

जैसे मेहमान आते हैं कुछ दिनों के लिए और ये बेजान दीवारें जैसे जीवित हो जाती हैं। मैं कुछ कंपन महसूस करती हूं इनमे ,जैसे श्वास चल रहा हो और ये मेहमान जाते ही, धीरे धीरे इन कंपनों की तीव्रता भी कम हो जाती है और फिर वही बेजान दीवारें। 

आज कुछ ऐसा ही माहौल है यहां। बीते कुछ दिनों से इनमें सजीवता थी, मेरे चित्रों से जो रूबरू होने का मौका मिल रहा था इन्हें।

सांसे फिर शुरू हो गई थीं। पर आज मैं एक एक कर तस्वीरें उतार रही थी और मैंने महसूस की कम होती तीव्रता,  इन कंपनों की। 

और जब वापस यहां आकर बैठी हूँ तो ये खाली दीवारें, मुझे इतनी बेचैन कर रहीं हैं। अजीब सी शांतता का आभास जैसे कोई पूर्णगति को प्राप्त हो गया हो।

मुझसे बातें करती थी ये तस्वीरें और किसी के होने का अहसास भी कराती थीं। अब वो वापस लौट कर आएंगी या नहीं मैं नहीं जानती, पर अब फिर इन दीवारों को भरना चाहूँगी। किसी नए मेहमान के साथ, जिसकी खुशबू उसके जाने के बाद भी बरकरार रहे। 


श्रुतिका

25/3/2019

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